साहित्य का स्वरूप पर निबंध

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Essay On The Nature Of Literature

रूपरेखा : साहित्य का पर्यायवाची - साहित्य की परिभाषा - विद्वानों द्वारा साहित्य - उक्त विवेचन के अनुसार - साहित्य की विशेषताएँ - उपसंहार।

साहित्य का पर्यायवाची

सहित्य शब्द अंग्रेजी भाषा के लिटरेचर शब्द का पर्यायवाची माना जाता है। इस शब्द की सीमा बहुत व्यापक है। किसी भाषा में लिखित अर्थात्‌ अक्षरों में गुंथी हुई सम्पूर्ण सामग्री साहित्य या लिटरेचर कहलाती है। जीवन-बीमा निगम के कर्मचारी अपने नियम आदि का ज्ञान कराने वाली छपी हुई सामग्री को अपना साहित्य कहते हैं। औषधियों की कम्पनिया द्वारा प्रचार के लिए छापी हुई पुस्तिकाएँ तथा मूल्यसूची भी साहित्य ही कहलाती हैं। राजनीति, ज्योतिष, अर्थशास्त्र आदि विषयों के ग्रंथ भी साहित्य के अन्तर्गत गिने जाते हैं।

साहित्य की परिभाषा

साहित्य शब्द का प्रयोग सीमित अर्थ में होता है । संस्कृत-आचार्यों ने साहित्य को दो भागों में विभकत किया था काव्य और शास्त्र। काव्य में भावतत्त्व की प्रधानता होती है और शास्त्र में बुद्धि-वत्त्व की प्रधानता होती है । साहित्य-शास्त्र में काव्य के लिए ही साहित्य शब्द का प्रयोग होता है। यह काव्य या साहिल वही तत्त्व है, जिसे ललित कलाओं में काव्य-कला कहा गया है। आधुनिक काल में साहित्य और काव्य शब्दों का प्रयोग भी भिन्‍न- भिन्‍न अर्थों में होने लगा है । काव्य के अन्तर्गत केवल छन्दोबद्ध रचनाएं ही ली जाती हैं, जबकि साहित्य में सभी भावतत्त्व-प्रधान रचनाएं जैसे उपन्यास, कहानी, नाटक आदि आ जाती हैं। काव्य साहित्य का एक अंग है यह भी कहा जा सकता है। साहित्य शब्द सहित शब्द से बना है तथा सहित शब्द के दो अर्थ हैं, साथ-साथ अथवा मिला हुआ और हित अर्थात्‌ कल्याण की भावना से युक्त । सहित शब्द के इन दोनों अर्थों को ध्यान में रखकर साहित्य के स्वरूप पर विचार किया गया है।

विद्वानों द्वारा साहित्य

विद्वानों द्वारा साहित्य की एक अपनी परिभाषा है जैसे कविवर रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य की परिभाषा इस प्रकार की है, सहित शब्द से साहित्य में मिलने का एक भाव देखा जाता है। वह केवल भाव-भाव का, भाषा-भाषा का, ग्रंथ-ग्रंथ का ही मिलन नहीं है, बल्कि मनुष्य के साथ मनुष्य का, अतीत के साथ वर्तमान का, दूर के साथ निकट का अत्यन्त अन्तरंग मिलन भी है, जो साहित्य के अतिरिक्त अन्य से सम्भव नहीं है। साहित्य का हित अर्थात्‌ कल्याण की भावना से युक्त होना भी अनिवार्य है। सचाई तो यह है कि जिस रचना में मनुष्य-मनुष्य के, दूर और निकट के, अतीत और वर्तमान के समन्वय का भाव होगा, वह निश्चित ही मानव के लिए कल्याणकारी भी होगी। मानव को कुमार्ग से हटकर सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देना ही साहित्य का उद्देश्य है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने साहित्य की परिभाषा इस प्रकार की है, ज्ञान राशि के संचित कोश का नाम साहित्य है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने साहित्य की परिभाषा इस प्रकार की है, मानव-समाज की चित्तवृत्तियों का प्रतिबिम्ब ही साहित्य है। इसीतरह, साहित्य संसार के प्रति हमारी मानसिक प्रतिक्रिया अर्थात्‌ बिचारों, भावों और संकल्पों की शाब्दिक अभिव्यक्ति है और वह हमारे किसी-न-किसी प्रकार के हित का साधन करने के कारण संरक्षणीय हो जाती है यह बाबू गुलाबराय जी का कहना है।

उक्त विवेचन के अनुसार

साहित्य की परिभाषा निर्धारित करते हुए सहित शब्द के इन अर्थों के अतिरिक्त एक अन्य उक्ति भी सामने आती है। वह है सत्यम्‌, शिवम, सुन्दरम्‌। इस उक्ति का सरल अर्थ है कि साहित्य में सत्य का चित्रण होता है, उसमें शिवम्‌ अर्थात्‌ मानव-कल्याण की भावना होती है और उसकी रचना-शैली सुन्दर होती है। उक्त विवेचन के अनुसार हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि -

(क) साहित्य में सम्मिलन की शक्ति होती है।

(ख) उसमें जीवन के शाश्वत सत्य का चित्रण होता है।

(ग) वह मानव को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा देकर उसका कल्याण करता है।

(घ) उसकी रचना-शैली रोचक तथा प्रभावोत्पादक होती है।

जिस प्रकार हमारे जीवन के दो पक्ष हैं जैसे आत्मा और शरीर, उसी प्रकार साहित्य के भी दो पक्ष हैं, भावपक्ष और कलापक्ष। भावपक्ष साहित्य की आत्मा और कलापक्ष उसका शरीर कहा जा सकता है।

साहित्य की विशेषताएँ

साहित्य एक कला है, जिसके द्वारा साहित्यकार अपनी अनुभूति को प्रकट करता है। इस प्रकार स्पष्ट है कि साहित्य के दो पक्ष हैं । पहला पक्ष है, वे अनुभव, भाव आदि, जिन्हें प्रकट करने के लिए साहित्य का निर्माण होता है और दूसरा पक्ष है, वह भाषा-

शैली आदि, जिनके द्वारा साहित्यकार अपने अनुभवों को प्रकट करता है । पहला पक्ष अर्थात्‌ साहित्यकार की अनुभूति भावपक्ष कहलाती है और दूसरा पक्ष अर्थात्‌ भाषा-शैली कलापक्ष। इन्हें क्रमश: अंतरंग (भीतरी) और बहिरंग (बाहरी) पक्ष भी कहते हैं। साहित्य में भाव-पक्ष की प्रधानता होती है। इसे काव्य (साहित्य) की आत्मा स्वीकार किया जाता है । इसके बिना साहित्य का अस्तित्व ही नहीं रह जाता। कलापक्ष तभी साहित्य का सौंदर्य बढ़ा सकता है, जब वह सूंदर भावनाओं रूपी प्राणों से सम्पन्न हो। रोगी शरीर में स्थित आत्मा भी स्वस्थ नहीं रह सकती। सूंदर अनुभूतियों को सूंदर शैली में प्रस्तुत कराने पर ही उनका गौरव बढ़ता है।

उपसंहार

तात्पर्य यह है कि साहित्य में भावपक्ष और कलापक्ष, दोनों का समन्वय होना चाहिए। जिस रचना में ये दोनों पक्ष सबल होंगे, वही रचना श्रेष्ठ साहित्य की कोटि में आ सकती है।

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